पाकिस्तान में एक हाई-प्रोफाइल इफ्तार बैठक के बाद बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. 19 मार्च को हुई इस बैठक में पाकिस्तान के आर्मी चीफ फील्ड मार्शल असीम मुनीर और देश के प्रमुख शिया उलेमा आमने-सामने थे, लेकिन यह मुलाकात अब राष्ट्रीय स्तर पर बहस का मुद्दा बन गई है.
सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक में आर्मी चीफ ने करीब एक घंटे तक लगातार अपनी बात रखी और उलेमा को जवाब देने या अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया. बैठक में मौजूद लोगों का कहना है कि माहौल काफी तनावपूर्ण था और बातचीत एकतरफा रही. विवाद की सबसे बड़ी वजह जनरल मुनीर का एक बयान बना, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर कहा, 'अगर आपको ईरान से इतना लगाव है, तो आप वहां चले जाएं.' इस बयान को शिया समुदाय ने अपनी देशभक्ति पर सवाल उठाने के रूप में देखा है. कई उलेमा ने इसे अपमानजनक और अस्वीकार्य बताया.
क्या बोले शिया समुदाय के लोग?
मौलाना हसनैन अब्बास गर्देजी ने कहा कि इस तरह की भाषा एक संवैधानिक पद पर बैठे अधिकारी के लिए उचित नहीं है. वहीं अल्लामा नजीर अब्बास तकवी ने भी कहा कि उन्होंने बैठक में कई बार संवाद की कोशिश की, लेकिन उन्हें बोलने का मौका नहीं दिया गया. बताया जा रहा है कि डिनर के बाद दूसरी बैठक का वादा किया गया था, लेकिन आर्मी चीफ अचानक चले गए. इस पूरे विवाद के बाद शिया नेताओं ने ऐतिहासिक संदर्भ भी दिया. उनका कहना है कि पाकिस्तान के निर्माण में शिया समुदाय की अहम भूमिका रही है और उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाना गलत है. उन्होंने यह भी कहा कि मक्का, मदीना, इराक और ईरान जैसे धार्मिक स्थलों से भावनात्मक जुड़ाव होना कोई नई बात नहीं है और इसे देशभक्ति से जोड़कर देखना गलत है.
जिया-उल हक की तरह तानाशाही कर रहे मुनीर
इस विवाद ने अब पाकिस्तान के धार्मिक और राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया है. शुक्रवार को सैयद जवाद नकवी ने सीधे तौर पर आर्मी चीफ के रवैये पर हमला बोला और इसे जनरल जिया-उल-हक के दौर की नीतियों से जोड़ दिया. उनका कहना था कि जिस तरह उस दौर में शिया समुदाय पर दबाव बनाया गया था, उसी तरह का माहौल फिर बनता दिख रहा है. नकवी ने यह भी आरोप लगाया कि पाकिस्तान अब देशभक्ति की परिभाषा को अपने हिसाब से तय कर रहा है, जहां किसी धार्मिक या वैचारिक जुड़ाव को शक की नजर से देखा जा रहा है. उन्होंने साफ कहा कि ईरान के साथ धार्मिक या भावनात्मक संबंध को देश के खिलाफ खड़ा करना गलत नैरेटिव है. वहीं उलेमा का एक बड़ा आरोप यह भी है कि सेना की कुछ रणनीतिक नीतियों, खासकर विदेशी ताकतों को सैन्य ठिकाने देने जैसे फैसलों पर सवाल उठाने वालों को दबाने की कोशिश हो रही है.
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