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जेएनयू में प्रधानमंत्री मोदी , शाह के खिलाफ नारेबाजी, वीडियो वायरल, प्रशासन ने FIR की मांग की



नई दिल्ली:
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) एक बार फिर राजनीतिक विवाद के केंद्र में आ गया है। विश्वविद्यालय परिसर में कुछ छात्रों द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ नारेबाजी का मामला सामने आया है। इस घटना से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसके बाद राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएँ देखने को मिल रही हैं।

क्या है पूरा मामला

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह नारेबाजी 5 जनवरी 2020 की जेएनयू हिंसा की बरसी और हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के संदर्भ में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान हुई। इसी कार्यक्रम में छात्रों के एक समूह ने कथित तौर पर आपत्तिजनक और भड़काऊ नारे लगाए, जिन्हें लेकर विवाद खड़ा हो गया।

वीडियो हुआ वायरल

घटना का वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर वायरल होते ही मामला तूल पकड़ने लगा। वीडियो में सुने गए नारों को लेकर कई लोगों ने कड़ी आपत्ति जताई और इसे लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ बताया।

जेएनयू प्रशासन की प्रतिक्रिया

जेएनयू प्रशासन ने इस घटना की कड़ी निंदा की है। विश्वविद्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि इस तरह के नारे शैक्षणिक वातावरण और लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत हैं।
प्रशासन ने दिल्ली पुलिस से इस मामले में FIR दर्ज करने की मांग भी की है और कहा है कि दोषियों के खिलाफ नियमों के तहत कार्रवाई की जाएगी।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ तेज

  • भाजपा नेताओं ने नारेबाजी की कड़ी आलोचना करते हुए इसे देश की एकता और लोकतंत्र के खिलाफ बताया।

  • वहीं विपक्षी दलों के कुछ नेताओं ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ते हुए कहा कि विरोध दर्ज कराने के कई तरीके होते हैं, हालांकि उन्होंने आपत्तिजनक भाषा के प्रयोग से दूरी बनाने की बात भी कही।

छात्रों के संगठनों की सफाई

कुछ छात्र संगठनों ने दावा किया है कि वीडियो को एकतरफा तरीके से पेश किया जा रहा है और पूरे कार्यक्रम को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। उनका कहना है कि विरोध का उद्देश्य किसी को धमकाना नहीं, बल्कि असहमति दर्ज कराना था।

आगे क्या?

फिलहाल यह मामला दिल्ली पुलिस और विश्वविद्यालय प्रशासन के संज्ञान में है। यदि FIR दर्ज होती है तो जांच के बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।
जेएनयू एक बार फिर इस बहस के केंद्र में है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी और जिम्मेदार भाषा के बीच की सीमा क्या होनी चाहिए।

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