प्रयागराज की पावन धरती पर माघ मेले के दौरान जो विवाद शुरू हुआ था, उसने अब एक बेहद तीखा और व्यक्तिगत रूप ले लिया है। खुद को ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य बताने वाले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और अखिल भारतीय संत समिति के स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती के बीच ऐसी बहस हुई कि मर्यादा की सीमाएं भी छोटी पड़ गईं।
एक तरफ अपमान का आरोप था, तो दूसरी तरफ परंपरा और 'राजनीतिक एजेंडे' का प्रहार। बात यहां तक पहुंच गई कि जितेंद्रानंद सरस्वती ने बेहद तल्ख लहजे में पूछ लिया कि जब पूरी दुनिया पैदल नहा रही थी, तो आपको ही पालकी पर चढ़कर जाने की क्या 'चुल्ल' मची थी? इस बहस ने धार्मिक और राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है।
"पचास मीटर पैदल नहीं चल सकते थे क्या?"
विवाद की शुरुआत माघ मेले में गंगा स्नान के दौरान हुई थी। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का आरोप है कि प्रशासन ने उन्हें रोका और उनके शिष्यों व बटुकों के साथ मारपीट की। इसी का जवाब देते हुए स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने मोर्चा खोल दिया। उन्होंने कहा कि माघ मेले में 'शाही स्नान' या 'पालकी' से जाने की कोई परंपरा ही नहीं है। जितेंद्रानंद ने तीखे शब्दों में कहा, "जब देश के तमाम बड़े संत और श्रद्धालु पैदल जाकर गंगा मैया में डुबकी लगा रहे थे, तो आप 50 मीटर भी पैदल क्यों नहीं चल सके? ऐसी क्या मजबूरी थी कि आपको पालकी ही चाहिए थी?" उन्होंने आरोप लगाया कि अविमुक्तेश्वरानंद भीड़ में भगदड़ मचवाने और व्यवस्था खराब करने की 'चुल्ल' पाले हुए थे।
शंकराचार्य के पद पर 'सुप्रीम कोर्ट' की जंग
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपनी सफाई में कहा कि उनका अपमान सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि शंकराचार्य की परंपरा का अपमान है। उन्होंने दावा किया कि उनका पट्टाभिषेक विधिवत हुआ है और सुप्रीम कोर्ट के जिस आदेश का हवाला देकर प्रशासन उन्हें रोक रहा है, उसे आधा-अधूरा पेश किया गया है। उनके अनुसार, अदालत ने उन्हें शंकराचार्य के रूप में कार्य करने से नहीं रोका था, बल्कि एक 'छद्म हलफनामे' के आधार पर प्रशासन भ्रम फैला रहा है। उन्होंने कहा कि पालकी से जाना उनके स्वाभिमान और पीठ की गरिमा का सवाल था, जिस पर पुलिस ने अपमानजनक लहजे में बात की।
जितेंद्रानंद का बड़ा हमला
बहस तब और ज्यादा गरमा गई जब स्वामी जितेंद्रानंद ने इस पूरे मामले को राजनीतिक साजिश करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विरोध में इतने अंधे हो गए हैं कि वे देशद्रोह की सीमा तक चले जाते हैं। जितेंद्रानंद ने सवाल उठाया कि "अगर आप संत हैं तो बिहार में चुनाव लड़ने क्यों गए थे?" उन्होंने अविमुक्तेश्वरानंद को राजनीतिक दलों का 'हथियार' बताया। इस पर पलटवार करते हुए अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि जो 'गौ माता' के मुद्दे पर उनके साथ नहीं है, वे भी उसके साथ नहीं हैं, चाहे वह कोई भी दल हो।
स्वाभिमान बनाम परंपरा की लड़ाई
अविमुक्तेश्वरानंद बार-बार इसे दंडी संन्यासियों और बटुकों के अपमान से जोड़ रहे हैं, वहीं जितेंद्रानंद इसे नियम और अनुशासन का मामला बता रहे हैं। जितेंद्रानंद का साफ कहना है कि माघ मेला कोई कुंभ या महाकुंभ नहीं है जहां पालकी की जिद की जाए। यह पूरा विवाद अब केवल धर्म तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें कानून की पेचीदगियां, प्रशासनिक प्रोटोकॉल और 2027 के चुनावों की आहट साफ सुनाई दे रही है।
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