नई दिल्ली। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से जुड़े 51 पेपर बॉक्स एक बार फिर राजनीतिक और बौद्धिक हलकों में चर्चा का विषय बने हुए हैं। इन बॉक्सों को लेकर वर्षों से सवाल उठते रहे हैं कि इनमें ऐसा क्या दर्ज है, जिसे आज़ादी के दशकों बाद भी पूरी तरह सार्वजनिक नहीं किया गया। इतिहास, राजनीति और सत्ता के गलियारों में इन दस्तावेज़ों को लेकर समय-समय पर बहस तेज़ होती रही है।
क्या हैं नेहरू के 51 पेपर बॉक्स?
नेहरू के 51 पेपर बॉक्स दरअसल पंडित जवाहरलाल नेहरू के निजी और आधिकारिक दस्तावेज़ों का संग्रह बताए जाते हैं। इनमें उनके पत्राचार, निजी नोट्स, सरकारी फाइलों की प्रतियां, अंतरराष्ट्रीय नेताओं से संवाद और आज़ादी के बाद के शुरुआती वर्षों से जुड़े महत्वपूर्ण कागज़ शामिल होने की बात कही जाती है। यह दस्तावेज़ मुख्य रूप से नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम एंड लाइब्रेरी (NMML) से जुड़े बताए जाते हैं।
बॉक्सों में क्या हो सकता है?
माना जाता है कि इन बॉक्सों में कई ऐसे ऐतिहासिक विषयों से जुड़े दस्तावेज़ हो सकते हैं, जिन पर आज भी सवाल उठते हैं। इनमें कश्मीर मुद्दे की शुरुआती रणनीति, चीन के साथ संबंधों की पृष्ठभूमि, 1962 के युद्ध से पहले की कूटनीतिक बातचीत, नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़े संदर्भ, कांग्रेस की आंतरिक राजनीति और सत्ता हस्तांतरण से जुड़े निर्णय शामिल हो सकते हैं। हालांकि इन बातों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
विवाद क्यों है?
विवाद की सबसे बड़ी वजह यह है कि इन 51 पेपर बॉक्सों की सामग्री को लेकर पारदर्शिता का अभाव बताया जाता है। आलोचकों का कहना है कि यदि ये दस्तावेज़ ऐतिहासिक महत्व के हैं, तो उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए ताकि देश का इतिहास तथ्यों के आधार पर समझा जा सके। वहीं दूसरी ओर, यह तर्क भी दिया जाता रहा है कि कुछ दस्तावेज़ राष्ट्रीय हित, कूटनीतिक संवेदनशीलता या निजी प्रकृति के हो सकते हैं।
राजनीति में क्यों गरमाता है मुद्दा?
हर दौर में यह मुद्दा राजनीति से जुड़ता रहा है। विपक्षी दलों और कुछ इतिहासकारों का आरोप रहा है कि नेहरू परिवार से जुड़े दस्तावेज़ों को जानबूझकर सीमित रखा गया। वहीं कांग्रेस समर्थकों का कहना है कि यह मामला केवल राजनीतिक लाभ उठाने के लिए उछाला जाता है और दस्तावेज़ों को तय नियमों और प्रक्रियाओं के तहत ही देखा जा सकता है।
नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम की भूमिका
नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम एंड लाइब्रेरी को देश के प्रमुख शोध संस्थानों में गिना जाता है। यहां बड़ी संख्या में ऐतिहासिक दस्तावेज़, पांडुलिपियां और अभिलेख सुरक्षित हैं। 51 पेपर बॉक्स को लेकर यह संस्थान हमेशा यह कहता रहा है कि दस्तावेज़ों को आर्काइव नियमों और अनुसंधान मानकों के अनुसार ही उपलब्ध कराया जाता है।
इतिहास बनाम राजनीति
इतिहासकारों का एक वर्ग मानता है कि यदि सभी दस्तावेज़ सामने आते हैं, तो आज़ादी के बाद के कई फैसलों को नए सिरे से समझने का अवसर मिलेगा। वहीं कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी ऐतिहासिक व्यक्ति के निजी कागज़ों को सार्वजनिक करने से पहले संदर्भ और समय-सीमा का ध्यान रखना आवश्यक होता है।
आज भी क्यों कायम है रहस्य?
आज भी नेहरू के 51 पेपर बॉक्स पूरी तरह सार्वजनिक नहीं हो पाए हैं। इसी कारण यह सवाल बना हुआ है कि इनमें दर्ज तथ्यों से क्या भारत के इतिहास की कुछ अनकही परतें सामने आ सकती हैं या यह सिर्फ एक राजनीतिक मुद्दा बनकर रह गया है।
2008 से जुड़ा दावा और विवाद
इस पूरे मामले में 2008 का एक दावा भी अक्सर सामने आता है। कुछ राजनीतिक और वैचारिक हलकों में यह आरोप लगाया जाता रहा है कि 2008 में सोनिया गांधी ने नेहरू से जुड़े इन 51 पेपर बॉक्सों को अपने साथ ले जाया था। हालांकि, इस दावे को लेकर कोई सार्वजनिक, आधिकारिक दस्तावेज़ या न्यायिक पुष्टि सामने नहीं आई है। संबंधित पक्ष की ओर से समय-समय पर यह कहा जाता रहा है कि अभिलेखों का संरक्षण और उपलब्धता तय नियमों के तहत ही होती है।
आलोचकों का कहना है कि यदि 2008 में बॉक्सों की आवाजाही या स्वामित्व/कस्टडी में कोई बदलाव हुआ था, तो उसकी स्पष्ट और सार्वजनिक जानकारी दी जानी चाहिए। वहीं समर्थकों का तर्क है कि यह विषय अटकलों और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित है।
निष्कर्ष
नेहरू के 51 पेपर बॉक्स का मामला इतिहास, राजनीति और पारदर्शिता के बीच खड़ा एक बड़ा प्रश्न है। जब तक इन दस्तावेज़ों की कस्टडी, सामग्री और उपलब्धता को लेकर स्पष्ट, आधिकारिक विवरण सार्वजनिक नहीं होता, तब तक यह विषय बहस और अटकलों का केंद्र बना रहेगा। देश के इतिहास से जुड़े इस रहस्य पर आने वाले समय में क्या स्थिति स्पष्ट होती है, इस पर सभी की नज़र बनी हुई है।
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