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रूस की जंग में भारत के 10 बेटों की मौत, 25 की उम्र में विधवा हुईं पत्नियां; सरकार बोली- मर्जी से गए थे


सुप्रीम कोर्ट में याचिकाओं की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने बड़ा खुलासा किया। सरकार ने बताया कि रूस-यूक्रेन युद्ध में रूसी सेना की ओर से लड़ते हुए 10 भारतीय नागरिकों की मौत हो चुकी है।

याचिका में इनमें से ज्यादातर लोगों को नौकरी का झांसा देकर रूस ले जाने और फिर जबरन युद्ध में धकेलने का आरोप लगाया गया था, लेकिन सरकार ने कोर्ट को बताया कि इनमें से अधिकांश ने अपनी मर्जी से गए थे। मारे गए लोगों में ज्यादातर युवा हैं और भारत में उनकी 25-26 वर्षीय पत्नी विधवा हो गई हैं।

केंद्र सरकार ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि रूस-यूक्रेन युद्ध क्षेत्र में फंसे कई भारतीय नागरिकों ने अपनी मर्जी यानी स्वेच्छा से ऐसे कॉन्ट्रैक्ट पर साइन किए थे, जिसके चलते वे इस संघर्ष के बीच पहुंच गए। विदेश मंत्रालय ने यह जवाब उन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिया, जो रूस-यूक्रेन युद्ध में फंसे 26 भारतीय पुरुषों के परिवारों द्वारा दायर की गई थीं। याचिकाओं में फंसे हुए लोगों की सुरक्षित वापसी और मारे गए लोगों के पार्थिव शरीर भारत लाने की गुहार लगाई गई है। सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष इस मामले की सुनवाई हुई।

केंद्र सरकार (विदेश मंत्रालय) का पक्ष

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने सरकार का पक्ष रखते हुए कोर्ट को कई जानकारी दीं। उन्होंने बताया कि 26 में से 10 भारतीयों की मौत हो चुकी है। एक व्यक्ति पर आपराधिक मामला दर्ज है, जबकि एक अन्य व्यक्ति जानबूझकर वहीं रुका हुआ है। ASG ने बताया कि ये लोग अपनी मर्जी से कॉन्ट्रैक्ट साइन कर रहे हैं और कुछ एजेंट/बिचौलिए उन्हें ऐसा करने के लिए उकसा रहे हैं।

सरकार ने बताया कि प्रशासन एक बहुआयामी रणनीति पर काम कर रहा है और लोगों को ऐसे किसी भी कॉन्ट्रैक्ट को स्वीकार न करने की सलाह दे रहा है। अधिकारी सभी 26 परिवारों के संपर्क में हैं और लापता लोगों की स्थिति व ठिकाने का पता लगाने के साथ-साथ पार्थिव शरीरों को वापस लाने की कोशिश कर रहे हैं।

केंद्र ने शिकायत करते हुए कहा कि खुद परिवार सहयोग नहीं कर रहे हैं। ASG ने कोर्ट को बताया- कल ही उन्होंने (परिवारों ने) हमसे कहा कि 'आप पार्थिव शरीर अपने पास रखें, हम अदालत जा रहे हैं।' उनका यह व्यवहार है। इस मुद्दे के कई आयाम हैं और उन्हें हमारे साथ सहयोग करना चाहिए।

याचिकाकर्ताओं (परिवारों) का पक्ष

परिवारों की ओर से पेश हुए वकील ऋत्विक भनोट ने विदेश मंत्रालय पर लापरवाही और निष्क्रियता के आरोप लगाए। वकील ने स्पष्ट किया कि इन लोगों को रूस में नौकरी का झूठा झांसा देकर ठगा गया था। वहां पहुंचने पर उनके पासपोर्ट जब्त कर लिए गए और उन्हें जबरन युद्ध में शामिल होने के लिए मजबूर किया गया।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि विदेश मंत्रालय से कई बार गुहार लगाने के बावजूद कोई त्वरित कार्रवाई नहीं हुई। हालात यह हैं कि अनाधिकृत निजी व्यक्ति अधिकारियों से ज्यादा परिवारों की मदद कर रहे हैं।

DNA सैंपल की मांग

मृतकों की सही पहचान और पार्थिव शरीर वापस लाने के लिए याचिकाकर्ताओं ने अदालत से निर्देश देने की मांग की कि परिवारों के डीएनए (DNA) सैंपल लिए जाएं। अदालत का ध्यान उन 25-26 वर्षीय युवा विधवाओं और परिवारों की दयनीय स्थिति की ओर भी खींचा गया, जिन्होंने विदेशी धरती पर अपने प्रियजनों को खो दिया है।

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने विदेश मंत्रालय (MEA) को निर्देश दिया है कि वह अब तक उठाए गए कदमों पर एक विस्तृत 'स्टेटस रिपोर्ट' दाखिल करे। मामले को अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया गया है।

मामले की पृष्ठभूमि क्या है?

इससे पहले, 10 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने इन 26 परिवारों की याचिका पर केंद्र सरकार, विदेश मंत्रालय और रूस में भारत के राजदूत को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। याचिका में आरोप लगाया गया था कि इन युवाओं को शिक्षा या नौकरी के झूठे वादे पर रूस भेजा गया था। परिवारों ने मांग की है कि सरकार उनके रिश्तेदारों की सुरक्षा, कानूनी स्थिति और ठिकाने का पता लगाने के लिए तत्काल कूटनीतिक हस्तक्षेप करे। याचिका के अनुसार, कई बार अपील करने के बावजूद परिवारों को अपने रिश्तेदारों की कोई पुख्ता जानकारी नहीं मिल रही है कि वे हिरासत में हैं, घायल हैं या जबरन युद्ध लड़ रहे हैं।

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