अंबाला (हरियाणा)।
पिछले पाँच वर्षों में राजनीतिक बयानबाज़ी और खींचतान के बीच अंबाला शहर में कई ऐसे मूलभूत मुद्दे आज भी जड़े हुए हैं जिनका प्रभाव प्रतिदिन के जीवन पर सीधा पड़ रहा है। जनता ने विकास के बड़े वादों को सुना, लेकिन धरातल पर समस्याएँ जस-की-तस बनी हुई हैं।
🧹 1. साफ-सफाई और कचरा प्रबंधन
नगर निगम हर महीने कड़ों खर्च कर रहा है, लेकिन शहर की गलियों और मुख्य सड़कों पर कूड़े के ढेर आज भी आम बात हैं। रोज़ करीब 200 टन कचरा उत्पन्न होने के बावजूद उचित ढंग से उठना और निस्तारण नहीं हो पा रहा है। इससे गंदगी, बदबू और स्वास्थ्य संबंधी खतरे बढ़ रहे हैं।
🐂 2. लावारिस गोवंशों का आतंक
अंबाला की मुख्य सड़कों और बाजारों में घूमते अव्यवस्थित गोवंश कई बार दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं। निगम ने गोशाला निर्माण के वायदे कई बार किए, लेकिन डंगडेहरी गोशाला प्रोजेक्ट, जिसमें करीब ₹4.50 करोड़ खर्च होने थे, अदालती मामलों में अटका हुआ है और समाधान नहीं निकल पाया है।
🐶 3. लावारिस कुत्तों का बढ़ता खतरा
शहर में लावारिस कुत्तों के काटने के रोज़ाना 60-70 से अधिक मामले अस्पतालों में दर्ज हो रहे हैं। पहले चलाया गया नसबंदी अभियान बंद है और फिलहाल कुत्तों के लिए शेड/नसबंदी व्यवस्थाएँ अभी तक पूरी तरह लागू नहीं हो पाई हैं। इससे आम लोगों, खासकर बच्चों और बुजुर्गों, की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
📜 4. संपत्ति कर ID में व्यापक गड़बड़ी
करीब 1.23 लाख संपत्ति कर ID में नाम, पता, फोन और क्षेत्र (वर्गगज) जैसी सूचनाओं में भारी गलतियाँ और विसंगतियाँ हैं। इन त्रुटियों को सुधारने के लिए शिविर लगाए गए, लेकिन अब तक केवल लगभग 35,000 ID ही सत्यापित हो पाई हैं। इससे करदाता और प्रशासन दोनों के लिए परेशानी बनी हुई है।
🌧️ 5. जलभराव और ड्रेनेज समस्याएँ
अत्यधिक बारिश या हल्की वर्षा के दौरान भी कई इलाकों में नालों की सफाई न होने से जलभराव हो जाता है। जंडली पुल के पास से इंको चोक तक जाने वाले मार्ग समेत कई हिस्सों में जलभराव की वजह से सड़कें ख़राब होती जा रही हैं, जिससे यातायात और आवागमन दोनों समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।
📌 निष्कर्ष
ये पाँच प्रमुख समस्याएं — स्वच्छता, नियंत्रणहीन गोवंश/कुत्ते, संपत्ति कर विसंगतियाँ, और जलभराव — अंबाला के अधिकांश निवासियों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित कर रही हैं। पिछले पांच वर्षों में उठाए गए विकास वादे फिलहाल कारगर उपायों में रूपांतरित नहीं हो पाए हैं, जिससे जनता का भरोसा प्रशासन पर दबाव में दिख रहा है।
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